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कोरोनावायरस के साथ बैक्टीरिया का संक्रमण खतरा बढ़ा सकता है, फेफड़ों में इन दोनों का एक साथ होना जानलेवा

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कोरोनावायरस से जूझ रहे मरीजों में बैक्टीरिया के गंभीर संक्रमण का खतरा है। ये दो संक्रमण मिलकरमरीज की जान भी ले सकतेहैं। यह दावा, आयरलैंड की क्वींस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया है। उनके मुताबिक, कोविड-19 के मरीजों को हॉस्पिटल में इलाज या थैरेपी दिए जाने के दौरान बैक्टीरिया का संक्रमण हो सकता है। ट्रीटमेंट के दौरान मरीजों के लिए यह दोहरा संकट पैदा हो सकता है। दोनों एक-दूसरे को प्रभावित करते हैं शोधकर्ता प्रो. जोज़ का कहना है जब बैक्टीरिया और वायरस फेफड़ों में मौजूद होते हैं तो एक-दूसरे को उस हिस्से को डैमेज करने की क्षमता पर असर डालते हैं। फेफड़ों में बैक्टीरिया मौजूद होने पर ट्रीटमेंट के दौरान दी जाने वाली दवाओं का असर वायरस पर अलग होता है। इससे हालत और बिगड़ सकती है। अच्छे बैक्टीरिया पर कोरोना का बुरा असर शोधकर्ताओं के मुताबिक, जब कोरोनावायरस शरीर को संक्रमित करता है तो शरीर को फायदा पहुंचाने वाली बैक्टीरिया पर बुरा असर होता है। ये घटते हैं तो इम्युनिटी भी घटती है। ऐसे में संक्रमण का दायरा बढ़ता है, जो बीमारी को गंभीर बनाता है। प्रोफेसर जोज़ का कहना है कि पहले से संक्रमित मरीज मे...

टीम इंडिया के पूर्व कोच गायकवाड़ बोले- लार के इस्तेमाल पर बैन क्रिकेट को 50-60 साल पीछे ले जाएगा, 5 रन की पेनल्टी बहुत कम

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आईसीसी ने कोरोना का जोखिम कम करने के लिएलार के इस्तेमाल पर अस्थायी तौर पर रोक लगा दी है। नए नियम के तहत फील्डिंग कर रही टीम अगर गेंद चमकाने के लिए लार का इस्तेमाल करती है तो उसे दो बारवॉर्निंग दी जाएगी। अगर इसके बाद भी ऐसा होता है तो फील्डिंग करने वाली टीम पर 5 रन की पेनल्टी लगेगी। हमारे सहयोगीदिव्य भास्कर ने इस मामले में भारतीय क्रिकेट के टीम के पूर्व हेड कोच अंशुमन गायकवाड़ से बातकी। गायकवाड़ ने बताया कि आईसीसी ने यह फैसला खिलाड़ियों की सुरक्षा को देखते हुए लिया है। हालांकि, इससे क्रिकेट जरूर 50-60 साल पीछे चला जाएगा। उन्होंने कहा कि 5 रन की पेनल्टी बहुत कम है। हम 60 और 70 के दशक में लौट जाएंगे: गायकवाड़ गायकवाड़ बताते हैं कि सेफ्टी पहले और क्रिकेट बाद में है। आईसीसी ने जो फैसला लिया, वह सही है। ऐसा कहना कि इस वजह से बल्लेबाज को फायदा होगा, यह गलत है। जब हम खेलते थे, तब हमारे पास आज जैसी गेंद नहीं होती थी, जिस पर लार का इस्तेमाल करने से चमक आ जाए। 5-6 ओवर के बाद गेंद रफ हो जाती थी। उसी बॉल से हम गेंदबाजी करते और विकेट लेते थे। उस समय बॉल पर चमक वापस लाने का सवाल ही नहीं था। विकेट ले...

सोनभद्र में लड़की की पिटाई का फेक वीडियो गुजरात का निकला, पुलिस ने भास्कर को बताया - इसमें जाति वाला कोई एंगल नहीं

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क्या वायरल : सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो को उत्तरप्रदेश के सोनभद्र का बताया जा रहा है। दावा किया जा रहा है कि आदिवासी महिला के कुएं से पानी भरने पर सवर्णों ने उसकी पिटाई की। वीडियो के साथ वायरल हो रहे ट्वीट https://bit.ly/3dQRCxC https://twitter.com/KusumKailash/status/1270207777928097794 https://twitter.com/BrijeshBagi/status/1269964510846087168 फेसबुक पर भी वायरल फैक्ट चेक पड़ताल - सोनभद्र में ऐसी किसी घटना से जुड़ी खबर हमें इंटरनेट पर अलग-अलग कीवर्ड से सर्च करने पर भी नहीं मिली। लेकिन, सोनभद्र पुलिस के अधीक्षक की तरफ से जारी किया गया एक बयान मिला। इसे सोनभद्र पुलिस के आधिकारिक ट्विटर हैंडल और फेसबुक पेज पर अपलोड किया गया है।बयान में एसपी ने बताया कि जिस घटना का वीडियो वायरल हो रहा है वह असल में सोनभद्र की नहीं,बल्कि गुजरात की है। https://twitter.com/sonbhadrapolice/status/1269936046067740672 - गुजरात में 16 साल की लड़की की पिटाई से जुड़ी खबरें तलाशने पर हमें एशियानेट की एक खबर मिली। इस खबर के अनुसार, गुजरात के छोटा उदयपुर तालुका के बिलवंत गांव में ऐसी ही एक घटना हु...

कोरोना से बचाने वाला LED मास्क, जो बताता है आप कब बोल रहे हैं और कब मुस्कुरा रहे हैं, एक मास्क की कीमत 3800 रुपए

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गेम डिजाइनर और प्रोग्रामर टेलर ग्लेयल ने खास तरह का मास्क तैयार किया है। इसे लगाकर बोलने पर एलईडी लाइट जलती है। ये लाइट बताती है सामने वाला कब बोल रहा है और कब चुप है। आपके मुस्कुराने पर मास्क के सामने स्माइली का सिम्बल बनता है। कपड़े के इस मास्क में 16 एलईडी लाइट लगी हैं। इसे तैयार करने वाले प्रोग्रामर टेलर का कहना है कि मैंने इसकी जरूरत महसूस की और वहीं से आइडिया पैदा हुआ। फिर, एक महीने लगातार मेहनत करने के बाद यह तैयार हो गया। एक मास्क की लागत करीब 3800 रुपए आई है। अचानक दिमाग में आया था आइडिया अमेरिकी प्रोग्रामर टेलर के मुताबिक, मास्क में वॉइस पैनल लगा है जो एलईडी से जोड़ा गया है। जो इंसान के बोलने और चुप रहने जैसी हरकत होनेपर जलती हैं। टेलर कहते हैं, मास्क को बनाने का आइडिया अचानक दिमाग में आया था। मैंने ऑनलाइन ऐसा मास्क ढूंढा, जब नहीं मिला तो खुद ही इसे तैयार किया। मास्क धोने से पहले एलईडी लाइट्स निकाली जा सकती हैं टेलर बताते हैं, मास्क को तैयार करने में एक माह का समय लगा था। यह कपड़े का बना है, इसलिए जब इसे धोना हो तो एलईडी लाइट के पैनल को निकालकर बाहर किया जा सकता है। इसमें ...

5 साल की बेटी को फ्रैक्चर के इलाज के लिए अस्पताल ले गए तो उसे संक्रमण हुआ, मां का सैम्पल लिए बिना कहा- रिपोर्ट पॉजिटिव है

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सवाई मानसिंह अस्पताल (एसएमएस) राजस्थान का सबसे बड़ा अस्पताल है। वही अस्पताल जिसने इटली की दंपती सहित सैंकड़ों कोरोना संक्रमित मरीजों का पिछले तीन माह में इलाज किया।पिछले दिनों इस अस्पताल को कोविड फ्री कर यहां भर्ती सभी मरीजों को प्रताप नगर स्थित आरयूएचएस में शिफ्ट कर दिया गया। स्वास्थ्य विभाग ने यह भी निर्देश जारी कियाकि एसएमएस अस्पताल के डॉक्टर्स आरयूएचएस में भर्ती मरीजों का इलाजकरने जाएंगे। हम मरीजों के इलाज की व्यवस्था का हाल जानने आरयूएचएस पहुंचे। करीब चार से पांच घंटे अस्पताल के बाहर रुके। वहां आने-जाने वाले मरीजों के परिजन और छुट्‌टी लेकर घर लौट रहे मरीजों से बातचीत की। अपनी बच्ची को चिप्स खिलाते हुए गुलाम मोहम्मद। इसी बीच अस्पताल के बाहर ऑटो रिक्शा के इंतजार में सड़क किनारे एक व्यक्ति अपनी बेटी के साथ बैठा नजर आया। पांच साल की इस बच्ची के हाथ में प्लास्टर बंधा हुआ था और वो अपने पिता के साथ खेल रही थी। कुछ देर बाद अस्पताल के गेट से एक महिला भी निकलकर बाहर आई और वहीं बैठ गई। तब बच्ची उस महिला की गोद में आकर बैठ गई। इस सवाल पर कि क्या आपका भी कोई अस्पताल में भर्ती है?तो उस बच्च...

दुनिया में कोरोना ने सबसे ज्यादा ‘पॉलिटिकल’ क्लास को प्रभावित किया, ब्रिटेन-रूस के पीएम समेत दस बड़े भारतीय नेता हुए संक्रमित

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दुनियाभर मेंकोरोना संक्रमण तेजी से फैल रहा है।भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 2 लाख 87हजार पार कर गई है। जबकि आठ हजार से अधिक लोगों ने इसकी वजह से देश में जान गंवाई है। दुनिया में 71 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हुए हैं और मरने वालों की संख्या 4 लाख पार कर चुकी है। यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के प्रोफेसर फ्रैनकोइज बालोक्स के मुताबिक, दुनिया में कोरोना ने जिस ‘क्लास’ को सबसे ज्यादा प्रभावित किया है वो पॉलिटिक्स है। उन्होंने इसके पीछे तर्क दिया है कि राजनेता लोगों के संपर्क में ज्यादा आते हैं। वो बार-बार हाथ मिलाते हैं और बैठकें भी बाकी लोगों से ज्यादा करते हैं। इसके अलावा जो दूसरी वजह गिनाई है वो ये कि ज्यादातर देशों में राजनेताओं की औसत उम्र ज्यादा है। रिसर्च के मुताबिक, राजनेता पॉजिटिव मरीज के संपर्क में आने के बाद भी खुद को क्वारैंटाइन नहीं कर रहे। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प हैं। इसके अलावा दफ्तर, स्कूल या कॉलेज की तरह पॉलिटिकल एस्टेब्लिशमेंट लॉकडाउन के दौरान भी बंद नहीं किए गए। भारत के साथ ही दुनिया के कई देशों के शीर्ष राजनेता कोरोनावायरस की चपेट में आ चुके ...

इंडिया या भारत का सवाल ही अजीब है, ऐसा है तो और पीछे जाकर क्यों न हम इसका नाम मेलुहा या आर्यावर्त रख दें!

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पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में देश का नाम इंडिया से बदलकर भारत रखने की मांग की गई। तर्क दिया गया कि भारत नाम से भारतीयों में राष्ट्रभक्ति और गर्व की भावना बढ़ेगी। इसके समर्थन में किए गए अधिकांश ट्वीट्स में कहा गया कि इंडिया अंग्रेजों का दिया हुआ नाम है, जबकि भारत असली नाम है। हम आज स्वतंत्र राष्ट्र हैंं, ऐसे में अपने इतिहास में जरूरी संशोधन करने चाहिए, अपनी प्राचीन संस्कृति को पुनर्जीवित करना चाहिए और औपनिवेशिक अतीत की याद दिलाती हर चीज़ को हटा देना चाहिए। यह साफ है कि राष्ट्रवाद को खोजते हुए नए समय में प्रवेश कर रहे हैं। अब मेक इन इंडिया को मेक इन भारत हो जाना चाहिए। और जो भी चीज़ें मेड इन भारत नहीं है उन्हें खारिज कर देना चाहिए। संक्षेप में कहें तो यह वैश्वीकरण की खोज का अंत होगा और महाशक्ति बनने के सपने का भी। यह नया नहीं है। इसी के लिए हमने ब्रिटिश काल की कुछ नायाब मूर्तियांहटा दीं, जिनमें काला घोड़ा में लंदन के मूर्तिकार सर जोसेफ बोहेम द्वारा बनाई एडवर्ड सप्तम की मूर्ति भी शामिल थी। हम भूल जाते हैं कि बॉम्बे को यह तोहफा इस शहर को बसाने में योगदान देने वाले ससून प...

कोरोना ने हमारे देश की क्षमता की परीक्षा ली है, इस संकट काल से हमें 10 जरूरी सबक मिले

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चीनी जब ‘क्राइसिस’ (संकट) शब्द लिखते हैं तो दो ब्रशस्ट्रोक्स इस्तेमाल करते हैं। एक का मतलब है डर, दूसरे का अवसर। कुछ देश डर से भर जाते हैं, कुछ खुद को बेहतर बनाने के रास्ते तलाशते हैं। कोरोना ने हमारे देश की क्षमता की परीक्षा ली है। इसमें भारत का प्रदर्शन कैसा रहा और हमने अब तक क्या सीखा है? पहला सबक यह है कि सरकार की शक्ति का हथौड़ा लोगों के जीवन पर सावधानीपूर्ण विनम्रता से पड़ना चाहिए। भारत का लॉकडाउन दुनिया में सबसे सख्त था और शायद सबसे दु:खदायी भी। एक आघात में लाखों की नौकरी चली गई। रोज दिहाड़ी कमाने वालों के लिए इसका मतलब गरीबी और भुखमरी तक था। समझदारी से लक्ष्य तय कर किया गया लॉकडाउन शायद एक अरब लोगों को नुकसान पहुंचाए बिना कुछ संक्रमित लोगों की रक्षा कर पाता। प्रवासियों को घर जाने का समय देने पर इतने दर्द से बच सकते थे। दक्षिण अफ्रीका ने एक हफ्ते और बांग्लादेश ने चार दिन का नोटिस दिया। ‘महामारी’ शायद बहुत कठोर शब्द था, जिससे प्रवासी इतना डर गया कि वह बस मरने के लिए घर जाना चाहता था। संक्रमित 1 से 3% लोगों की टेस्टिंग, ट्रेसिंग आदि पर निवेश ज्यादा होता, जो शायद सभी आर्थिक गतिविध...

मांग में कमी और मजदूरों की गैरहाजिरी रोक रही टेक्सटाइल इंडस्ट्री की रफ्तार; गुजरात में 35% तो राजस्थान में 50% क्षमता से हो रहा काम

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अनलॉक-1 के बाद देश के बड़े उद्योग धीरे-धीरे करवट बदलने लगे हैं।कुछ उद्योग रफ्तार भी पकड़ने लगे हैं। देश की सबसे पुरानी और बड़ी इंडस्ट्री में शुमार टेक्सटाइलभी इनमें से एक है। हालांकि, मांग में कमी और लेबर इंटेंसिव होने के चलते अन्य उद्योगों के मुकाबले इसे अधिक मुश्किलें उठानी पड़ रही हैं। दरअसल, लॉकडाउन के दौरान ज्यादातर मजदूर अपने गांवों को लौट चुके हैं और मांग में भी काफी कमी आ गई है। ऐसे में चाहकर भी यह इंडस्ट्री 35 से 50%से अधिक उत्पादन नहीं कर रही है।25 हजार करोड़ के टर्नओवर वाली गुजरात की टेक्सटाइल इंडस्ट्री बीते तीन हफ्तों में सक्रिय हुई है। हालांकि, मजदूरों की कमी के चलते 35%क्षमता तक ही उत्पादन हो रहा है। देश में 20 लाख से अधिक पावरलूम हैं, जिनमें से 6.5 लाख गुजरात में हैं। इसमें भी अकेले सूरत में 4.5 लाख पावरलूम इकाइयां हैं। अगले तीन महीने तक उत्पादन सामान्य होना संभव नहीं अहमदाबाद टेक्सटाइल एसोसिएशन के वाइस प्रेसिडेंट नरेश वर्मा के मुताबिक, कोरोना के चलते पूरी वैल्यू चेन बेटपरी हो गई है। अगले दो से तीन महीने तक मजदूरों की वापसी के आसार नहीं है। ऐसे में अगले तीन महीने तक...

पर्सनलाइज्ड लर्निंग में बिग डाटा एनालिसिस बड़ा रोल प्ले करेगा, स्टूडेंट्स की जरूरतों को देखकर टीचर पढ़ाने का तरीका बदल सकते हैं

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कोविड-19 के इस संकट भरे दौर में शिक्षा के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव आया है। यूनेस्को के अनुसार लॉकडाउन में शैक्षणिक संस्थाएं बंद कर देने से दुनिया भर के 90% छात्रों की शिक्षा प्रभावित हुई। ऐसे में ऑनलाइन एजुकेशन की महत्ता सामने आई है। हालांकि स्टूडेंट्स हमेशा से ही ऑनलाइन लर्निंग के तरीकों को अपनाने के लिए तैयार रहते थे, लेकिन अब पैरेंट्स की सोच में महत्वपूर्ण बदलाव हुआ है। बच्चों के डिजिटल स्क्रीन पर पढ़ाई को लेकर चिंतित अभिभावक अब इसके फायदे देख रहे हैं। सिर्फ पैरेंट्स ही नहीं, टीचर्स का भी ऑनलाइन लर्निंग के प्रति झुकाव बढ़ा है। स्मार्ट डिवाइस और इंटरनेट की आसान पहुंच के चलते ऑनलाइन लर्निंग पढ़ाई की मुख्यधारा में शामिल हो गई है। भारत में दुनिया का सबसे बड़ा के-12 एजुकेशन सिस्टम (किंडरगार्डन और 12 साल बेसिक एजुकेशन) है, लेकिन यह स्टूडेंट्स में परीक्षाओं का डर भरता है और सभी को एक ही तराजू में तौलता है। मौजूदा परिस्थितियों में यह सुखद बात है कि पूरा एजुकेशन सेक्टर ही ऑनलाइन की तरफ देख रहा है। कई शिक्षण संस्थाएं ऑफलाइन से ऑनलाइन टीचिंग को तवज्जो दे रही हैं। हालांकि ये बदलाव समय की ज...

अब अपने दम पर और अपनी सोच से जॉब लेने का समय, लॉकडाउन में जो अंतरात्मा की आवाज सुनी थी उसे दबाइएगा मत

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सूरज का एक सपना था कि मैं इंजीनियर बनूंगा। क्लास 8 से वो सपने को साकार करने में लगा था। पिताजी प्राइवेट कंपनी में साधारण पोस्ट पर थे मगर बच्चे की एजुकेशन में कोई कसर न छोड़ी। बढ़िया आईआईटी कोचिंग करवाई। आईआईटी में तो सिलेक्शन हुआ नहीं मगर एक ठीक-ठाक सरकारी कॉलेज में सीट मिल गई। फिर क्या था? आपको एडमिशन मिल गया तो समझो ‘लाइफ बन गई।’ यूं तो हम लेते हैं दाखिला कुछ पढ़ने के लिए पर हकीकत में उतना पढ़ते हैं कि पास हो जाएं। कॉलेज में कई नामी प्रोफेसर थे, इक्विपमेंट थे, मगर सूरज ने इनपर ध्यान नहीं दिया। उसे चाहिए थे अच्छे मार्क्स और नौकरी। मेकैनिकल इंजीनियर हो तो क्या हुआ, आप भी आईटी कंपनी के एंट्रेस एग्जाम में बैठ सकते हो। फैक्टरी से बेहतर एक चिल्ड एसी ऑफिस मिलेगा। सूरज ने भी यही रास्ता अपनाया। प्लेसमेंट भी हो गया। घर पर सब खुश। और फिर उथल-पुथल हो गई। मार्च में कोरोना फैला तो स्टूडेंट्स घर भागे। एग्जाम ऑनलाइन दिए या कैंसल हो गए। उससे भी बड़ी विपत्ति कि जॉब ऑफर कैंसल होने लगे। किसी कंपनी ने कहा जून में नहीं सितंबर में जॉइन करो। सूरज की कंपनी ने तो ऑफर ही वापस ले लिया। अब बैठे हैं जनाब बीटेक की ड...

पुलिसबल की कम संख्या चिंताजनक, समय पर पुलिस सुधार होते तो कोरोना से जंग आसान होती

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कोरोना त्रासदी से सीधे तौर पर जूझ रहे स्वास्थ्यकर्मियों, सफाईकर्मियों और पुलिसकर्मियों के लिए चुनौतियां बढ़ती जा रही हैं। अनलॉक के दौर में सड़कों पर बढ़ती संख्या कोरोना योद्धाओं के सम्मुख नई-नई स्थितियां ला रही है। अन्य मुल्कों के मुक़ाबले हमारे संघीय ढांचे में कानून व्यवस्था राज्य सूची का विषय है और उसे अमली जामा पहनाने वाला पुलिसतंत्र संबंधित राज्य सरकारों के अधीन होता है। पुलिस के प्रति हर राज्य सरकार का अलग-अलग नजरिया भी जग जाहिर है, मसलन किसी राज्य सरकार के लिए पुलिस पहली प्राथमिकता है तो किसी राज्य सरकार की नजर में पुलिस आवश्यक बुराई स्वरूप है। आंकड़े बताते हैं कि जहां जम्मू कश्मीर, पंजाब और उत्तर पूर्वी राज्यों में पुलिसकर्मियों की उपलब्धता प्रति एक लाख की आबादी पर 500 से ऊपर है तो वहीं उत्तरप्रदेश, बिहार, आंध्रप्रदेश और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में यह उपलब्धता 100 प्रति लाख के आस-पास है। संयुक्त राष्ट्र मानदंड यह उपलब्धता 230 प्रति लाख होने की बात करते हैं। 130 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश में पुलिसकर्मियों के स्वीकृत पदों की संख्या तकरीबन 28 लाख ही है जिसमें 25-30% पद खाली ह...

अमेरिका में 71% गोरों ने माना- नस्लवाद सबसे बड़ी समस्या, 10 में से 6 लोग बोले- पुलिस अश्वेतों से भेदभाव करती है

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पुलिस के हाथों जॉर्ज फ्लॉयड की मौत के बाद पूरे अमेरिका में प्रदर्शन हो रहे हैं। साथ ही अमेरिकियों की सोच में भी बदलाव दिख रहा है। इसका सबसे बड़ा सबूत यह है कि करीब 10 में 8 अमेरिकियों ने माना है कि नस्लवाद और भेदभाव बड़ी समस्या है। 2015 के बाद यानी महज 5 साल में ऐसा मानने वालों की संख्या 26% बढ़ गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि 71% श्वेत ऐसा मानते हैं। नस्लवाद और भेदभाव पर अमेरिकी इतिहास की यह सबसे बड़ी सहमति है। 10 में 6 अमेरिकी यह भी मानते हैं कि पुलिस भी श्वेत की तुलना में अश्वेतों के साथ ज्यादा बर्बरता करती है। जॉर्ज फ्लॉयड के साथ जिस मिनोपोलिस में घटना हुई, वहां की 20% आबादी अश्वेत है। इनमें से करीब 9 फीसदी अश्वेत पुलिस में हैं। इसके बावजूद मिनोपोलिस में पुलिस के अत्याचारों का सबसे ज्यादा शिकार अश्वेत ही हैं। वे 7 गुना ज्यादा अत्याचार झेलते हैं। नागरिक अधिकारों पर काम करने वाले वकील और डेमोक्रेसी फॉर कलर के संस्थापक स्टीव फिलिप कहते हैं, "देश में जो कुछ हो रहा है, वह ऐतिहासिक है। यह निश्चित तौर पर एक बड़े बदलाव की तैयारी है। मेरा मानना है कि पुलिस की फंडिंग को कम कर साम...

बच्चे ऑड-ईवन के आधार पर हफ्ते में 3 दिन स्कूल आएंगे, दो शिफ्टों में भी बुलाए जा सकते हैं; कमरे के बजाय खुले में पढ़ाई हो तो बेहतर

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एनसीईआरटी ने स्कूल खोलने की तैयारियोंको लेकर सरकार को गाइडलाइन का ड्राफ्ट सौंप दिया है। ड्राफ्ट के अनुसार, स्कूल खुलने के बाद एक कक्षा के बच्चों को एक साथ स्कूल नहीं बुलाया जाएगा। इसके लिए रोलनंबर के आधार पर ऑड-ईवन फॉर्मूला लागू किया जाएगा या फिर दो शिफ्टों में कक्षाएं लगेंगी। बच्चों के स्कूल पहुंचने के समय में भी कक्षाओं के हिसाब से 10-10 मिनट का अंतराल होगा। ड्राफ्ट में यह भी कहा गया है कि सोशल डिस्टेंसिंग के लिए कक्षाएं खुले मैदान में लगाई जाएं तो बेहतर होगा। स्कूल खोलने के 6 चरण पहला चरण- 11वीं-12वीं की कक्षाएं शुरू होंगी। 1 हफ्ते बाद- 9वीं-10वीं की कक्षाएं शुरू होंगी। 2 हफ्ते बाद- 6वीं से 8वीं तक कक्षाएं शुरू होंगी 3 हफ्ते बाद- तीसरी से 5वीं तक शुरू होंगी। 4 हफ्ते बाद- पहली-दूसरी की कक्षाएं शुरू होंगी 5 हफ्ते बाद- अभिभावकों की सहमति से ही नर्सरी-केजी की कक्षाएं शुरू की जा सकेंगी। लेकिन, कंटेनमेंट जोन के स्कूल तब तक बंद ही रहेंगे, जब तक इलाका ग्रीन जोन नहीं बन जाता। स्कूल: क्लास में बच्चों के बीच 6 फीट की दूरी जरूरी क्लास रूम में 30 या 35 बच्चे ही बिठाए जा सकेंगे। छात...

हार्वर्ड मेडिकल स्कूल का दावा- चीन में पिछले साल अगस्त में ही शुरू हो गया था कोरोनावायरस का संक्रमण

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चीन में कोरोनावायरस का संक्रमण पिछले साल अगस्त में ही शुरू हो गया था। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल की स्टडी में यह दावा किया गया है। हालांकि चीन ने दुनिया को इस संक्रमण की जानकारी 31 दिसंबर को दी थी। स्टडी करने वाली टीम ने कमर्शियल सैटेलाइट इमेजरी की मदद से वुहान शहर की कुछ तस्वीरों की स्टडी की है। ये तस्वीरें अगस्त 2019 और इससे ठीक एक साल पहले की हैं। इनमें वुहान शहर के अस्पतालों के बाहर बड़ी संख्या में वाहन दिख रहे हैं। इससे पहले वुहान में इस तरह भीड़ सिर्फ संक्रमण के चलते ही दिखी है। स्टडी के अनुसार संभव है कि रिपोर्ट किए जाने से बहुत पहले ही चीन में कोरोना का प्रकोप शुरू हो चुका था। डॉक्टर्स शुरुआती तौर पर बीमारी पहचानने में नाकाम रहे अगस्त से ही वुहान के 5 बड़े अस्पतालों के बाहर आश्चर्यजनक तौर पर वाहनों की भीड़ थी। हालांकि ऐसा भी हो सकता है कि जो लोग अस्पताल पहुंचे उन्हें मौसम की वजह से खांसी-बुखार और डायरिया के मरीज समझकर इलाज किया गया हो। संभव है कि डॉक्टर्स को इस बीमारी के बारे में पता ही नहीं चला होगा। भारत में चीन से नहीं फैला कोरोना: आईआईएससी इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (आईआईए...

जो हमारे देश के खिलाफ काम करे, उसका सामान हम क्यों लें? मैं चीन में बना सामान इस्तेमाल नहीं करूंगा: संजय डालमिया

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चीन समेत कोई भी देश जो हमारे खिलाफ काम कर रहा है, हमें उसका सामान क्यों इस्तेमाल करना चाहिए? मैं खुद चीन में बना एक भी सामान इस्तेमाल नहीं करूंगा। जाने-माने उद्योगपति संजय डालमिया ने चीन के सामानों के खिलाफ देश में जारी मुहिम का समर्थन करते हुए ये बात कही। दैनिक भास्कर से विशेष बातचीत में डालमिया ग्रुप ऑफ कंपनीज के चेयरमैन ने कहा, ‘‘चीन ने एक साथ कई गड़बड़ियां की हैं। इससे हमारे देश को परेशानियां हो रही हैं। कोई भी देश जो हमारे खिलाफ काम करे, हम उसका सामान क्यों इस्तेमाल करें? हमें चीन के साथ-साथ पाकिस्तान के सामानों का इस्तेमाल भी तत्काल बंद कर देना चाहिए।’’ डालमिया ने कहा, ‘‘इससे दुनिया में एक संदेश जाएगा कि भारत के खिलाफ कदम उठाया तो उन्हें भारत के बड़े बाजार से हाथ गंवाना पड़ेगा। उन्होंने कहा कि भारत बहुत बड़ा बाजार है और कोई भी देश इसकी अनदेखी नहीं कर सकता। उन्होंने कहा कि आजादी से पहले हमने अंग्रेजों के सामानों का बहिष्कार कर उन्हें घुटने पर ला दिया था। अब भी हमें यही दोहराने की जरूरत है।’’ लोगों को जागरूक करने की जरूरत: डालमिया पाकिस्तान के लाहौर में जन्मे 76 साल के संजय डा...

सिंगापुर में दुनिया के सबसे बड़े कूलिंग सिस्टम से 40% ऊर्जा की बचत, यह 10 हजार कारों को सड़कों से हटाने जितना कारगर

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इक्वेटर के करीब होने के कारण सिंगापुर में तापमान सामान्य तौर पर 32 डिग्री सेल्सियस (90 डिग्री फारेनहाइट) तक पहुंच जाता है। लेकिन, यहां अवॉर्ड विनिंग बॉटनिकल गार्डन के पास मौजूद कई बहुमंजिला इमारतों में अधिकतम तापमान सिर्फ 24 डिग्री सेल्सियस ही रहता है। यहां भी एयर कंडीशनर की बदौलत ही तापमान को नियंत्रित रखा जा रहा है, लेकिन खासियत यह है कि यहां का एसी सिस्टम इको फ्रेंडली हैं। ये न सिर्फ बड़ी-बड़ी बिल्डिंग और परिसर को ठंडा रख रहा है बल्कि धरती को भी ग्लोबल वार्मिंग से बचा रहा है। इस सिस्टम का नाम है मरीना बे कूलिंग सिस्टम। यह पूरी तरह अंडरग्राउंड है। इससे ऊर्जा की 40 फीसदी तक बचत होती है। साथ ही पर्यावरण प्रदूषण में भी बड़ी कमी आई है। यह कूलिंग सिस्टम इको-फ्रेंडली है यह सिस्टम पाइप के जरिए आसपास के पांच किलोमीटर तक के इलाके में मौजूद घरों को कूलिंग की सुविधा उपलब्ध कराता है। इस सिस्टम से जितनी ऊर्जा बचती है उससे आम एयरकंडीशनर के जरिए 24 हजार अतिरिक्त घरों में कूलिंग दी जा सकती है। यह बचत ऐसी है मानों शहर की सड़कों से 10 हजार कारों को स्थाई रूप से हटा लिया गया हो। ऊर्जा खपत को नियंत...

68 साल की कैथी दुनिया की पहली महिला, जो स्पेसवॉक करने के बाद समुद्र के सबसे गहरे तल को छूकर लौटीं

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अमेरिका की 68 साल की डॉ. कैथी सुलिवान दुनिया की पहली ऐसी महिला बन गई हैं, जिन्होंने न केवल अंतरिक्ष में चहल-कदमी की, बल्कि समुद्र के सबसे गहरे स्थल मारियाना ट्रेंच में 35 हजार 810 फुट नीचे चैलेंजर डीप की सतह को भी छुआ है। उन्होंने यह कारनामा इयोस एक्सपेडिशंस नामक लॉजिस्टिक कंपनी के साथ मिलकर किया। उनके साथ विक्टर एल वेस्कोवो भी गए थे। दोनों ने चैलेंजर डीप पर करीब डेढ़ घंटा बिताया। फिर करीब 4 घंटे बाद वे वापस अपने जहाज पर पहुंचे और करीब 254 मील ऊपर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के अंतरिक्ष यात्रियों से बात भी की। डॉ. कैथी ने रविवार को यह उपलब्धि हासिल की। मारियाना ट्रेंच गुआम से करीब 200 मील दूर है। डॉ. कैथी ने कहा- एक अंतरिक्ष यात्री और समुद्री वैज्ञानिक होने की वजह से मेरे लिए यह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन था। उपलब्धि हासिल कर डॉ. कैथी ने कहा- ‘एक अंतरिक्ष यात्री और समुद्री वैज्ञानिक होने की वजह से मेरे लिए यह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण दिन था। जीवन में एक बार होने वाले चैलेंजर डीप को देखना और फिर इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन के साथियों के साथ नोट्स की तुलना करना सचमुच नहीं भूलने वाला पलहै। स...